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सोनू सूद ने उठाई बड़ी आवाज़: 16 साल से कम उम्र के बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल पर भारत से की बैन लगाने की अपील

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Posted On:Thursday, December 11, 2025

बॉलीवुड अभिनेता और समाज सेवा के लिए पहचाने जाने वाले सोनू सूद ने एक बार फिर बच्चों के भविष्य और उनकी भलाई को लेकर चिंता जताईहै। ऑस्ट्रेलिया में 16 साल से कम उम्र के बच्चों पर सोशल मीडिया प्रतिबंध लगाए जाने के फैसले के बाद, सोनू सूद ने भारत से भी ऐसा ही कदमउठाने की अपील की। अपने बयान में उन्होंने कहा कि बच्चों को “असली बचपन, मजबूत पारिवारिक रिश्ते और स्क्रीन की लत से आज़ादी” मिलनीचाहिए—और इसके लिए ठोस नीति बेहद ज़रूरी है।

ऑस्ट्रेलिया का नया कानून 9 दिसंबर 2025 से लागू होगा, जिसमें TikTok, Instagram जैसे प्लेटफॉर्म्स को अपने यूज़र्स की सही उम्र की पुष्टिकरना अनिवार्य होगा। सरकार का मानना है कि कम उम्र में सोशल मीडिया का अत्यधिक इस्तेमाल बच्चों के मानसिक विकास को प्रभावित कर सकताहै। दुनिया भर में हुई रिसर्च, जिसमें लैंसेट की 2023 की स्टडी भी शामिल है, बताती है कि सोशल मीडिया का अधिक उपयोग किशोरों में डिप्रेशनका खतरा दोगुना कर देता है—यही वजह है कि कई देश डिजिटल सेफ़्टी पर पहले से ज्यादा सख्त हो रहे हैं।

भारत में फिलहाल इस तरह के सीधे प्रतिबंध की चर्चा कम है, लेकिन एक्सपर्ट्स मानते हैं कि बच्चों के डिजिटल एक्सपोज़र पर बातचीत शुरू होनाबेहद ज़रूरी है। भारतीय विशेषज्ञों का कहना है कि शिक्षा, पैरेंटल गाइडेंस और जिम्मेदार डिजिटल आदतों पर फोकस भी कई समस्याएँ कम करसकता है। सोनू सूद की अपील ने इस बहस को तेज़ कर दिया है, और माता-पिता, शिक्षकों और सोशल मीडिया यूज़र्स के बीच इस पर बड़ी चर्चाछिड़ गई है।

दिलचस्प बात यह है कि सोनू सूद के पास आज भी सोशल मीडिया पर लोगों की मदद के संदेश आते रहते हैं, और वे अपनी व्यस्तता के बावजूद कईमामलों में व्यक्तिगत रूप से प्रतिक्रिया देते हैं। इसलिए उनकी बात सिर्फ एक अभिनेता की नहीं, बल्कि एक ऐसे इंसान की है जो रोज़ाना सोशलमीडिया के दोनों पहलू—फायदे और नुकसान—खुद अनुभव करता है।

एक तरह से, सोनू सूद की यह पहल एक बड़े सवाल को जन्म देती है—क्या भारत भी बच्चों की डिजिटल सेफ़्टी के लिए ठोस कदम उठाएगा? बढ़तेस्क्रीन टाइम और सोशल मीडिया की आदतों के बीच, सूद की अपील ने यह याद दिलाया है कि बच्चे सिर्फ लाइक्स और फॉलोअर्स नहीं, बल्कि एकसुरक्षित और संतुलित बचपन के हकदार हैं। और शायद अब समय आ गया है कि देश इस दिशा में गंभीरता से सोचे।


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